जीवन के इस दोराहे पर, चलते चलते अब रुक गए हैं पग, डगर भी है, मंज़र भी है, एक सुहाना सा दीखता सफ़र भी है।
पर अब मंजिल पर बदने को, प्यार से, दुलार से, हाथ पकड़ की चलने को, एक साथ का इंतज़ार है।
जीवन की भाषा पड़ने को, मान की आशा सुनने को, नाराज़ हो रूठने को, प्यार से फिर मानने को।
चीजों की हट करने को, देर रात तक लड़ने को, तस्वीर से बातें करने को, एक साथ का इंतज़ार है।
साथ मैं फ़िल्में देखने को, दूर रंगरलियाँ मानाने को, बारिश मैं भुट्टे खाने को, सर्दी में चाट उड़ने को, सुबह सुबह जगाने को, प्यार से हमें उठाने को, घर हमारा सजाने को, हर नाज़ अपना उठवाने को, एक साथ का इंतज़ार है।
मुश्किल में साथ निभाने को, ग़म में दो आंसू बहाने को, समस्या को सुलझाने को, प्रेम के दीप जलने को, मेरा संसार बसाने को, एक साथ का इंतज़ार है।
Friday, August 20, 2010
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