जब हम आए थे दुनिया में , नए जीवन की नींव लिए
अपनी इन नन्ही आंखों में , सपनो की तस्वीर लिए
नन्हे नन्हे हातों में, खाली आपनी तकदीर लिए
तब हाथ बड़ा कर बोले थे, आप मुझे अपनी बाँहों में ले
डरना मत में हूँ सदा, तेरे लिए तेरे ही लिए
बीमार होते थे जब भी हम, बेचैन आप हो जाते थे
पट्टी करती थी माँ हमे, पर चुप आप भी न रह पाते थे
जब नींद न हमको आती थी, सो आप भी तो न पाते थे
तकलीफ होती थी हम से भी ज़्यादा, पर आप न हमे दिखलाते थे
जब तक आता था न चैन हमे, दर्द में आप भी कराहते थे
मेरे जीवन की हर साँस पे आप, दुनिया से लड़ जाते थे
दिखते थे सबसे हिमात्वाले, पर अंदर से घबराते थे
कहते थे मुझे चिंता मत कर, में हूँ न यहाँ, तेरे लिए तेरे ही लिए
याद है उन काली रातों में , जब हम डर से नही सो पाते थे
हिमात चाहे हो न हो , आप हमारी हिम्मत बड्डाते थे
रात के अंधेरे वीरानों में, जब कोई आहट होती थी
आपकी डरी हुई से काया में, शेर सी हिम्मत होती
मनो खे रही हो हमे, चाहे कुछ भी हो दुनिया में
आंधी आए या पेड़ गिरे, पर तुम बिल्कुल भी डरो नही
में हूँ न यहाँ, तुम्हारे लिए तुम्हारे ही लिए
याद आते हैं वोह लम्हे भी, साथ बितए थे हमने कभी
बिन सोचे बिन जाने ही, लड़ लेते थे हम कभी कभी
पर तब भी देखा है में यह, आप कहते थे जिद नही
बात समझकर हमारी भी, पुरी करते थे कमी सभी
कहते थे की अभी तुम बच्चे हो, जीवन में थोड़े कच्चऐ हो
रहेगी कोशिश मेरी सदा, हो न तुम्हे कोई कमी कभी,
और इस जीवन में तुम्हे कभी, ज़रूरत हो मेरी कभी कहीं
तो आना तुम मेरे ही पास क्यूंकि में रहोंगा, यहाँ तुम्हारे लिए तुम्हारे ही लिए
पर अब डरता हूँ में उस पल को भी, जो शायद कल को आएगा
जब मेरे जीवन का यह अकेला सहारा मुझसे ही चीन जाएगा
कांपता हूँ यह सोचके में, जब कोई मुसीबत आएगी
जब मेरे जीवन की गाड़ी यह, पटरी से गिर जायेगी
जब डर लगेगा रात में, तो कोई सहारा न मुझे मिल पायेगा
बिन साँस के जैसे जीने को, मुझसे कहा तब जाएगा
जब होगी गलती मुझसे कभी, तो कहाँ में भाग के जाउँगा
किस के दरवाज़े पर जा कर में, अपना सुकून पाउँगा
कौन कहेगा फ़िर से मुझे,
डर मत बेटा में हूँ न यहा तेरे लिए तेरे ही लिए….
Saturday, September 12, 2009
कहीं दूर बियान बान मैं इक उजड़ा आशियाँ है
कहीं दूर बियान बान मैं, इक उजड़ा आशियाँ है
आए यहाँ पे हम थे, बस खाख ए ज़माना था
इन सूखती शाखों पे, फिर फूल खिलाना था
जो उजाडा था औरों ने, वोह फिर से बसना था
हर बूँद ने महनत की, तब फूल खिलाये थे
हर कतराए लहू से वोह महक आए थे
आब तो यह आलम है, आशियाँ चेहेकता है
नाम से हमारे गुलिस्तान मेहेकता है,
पर आब हमें है जाना, के इक और फसाना है
कहीं दूर बियान बान मैं, इक उजड़ा आशियाँ है...
आए यहाँ पे हम थे, बस खाख ए ज़माना था
इन सूखती शाखों पे, फिर फूल खिलाना था
जो उजाडा था औरों ने, वोह फिर से बसना था
हर बूँद ने महनत की, तब फूल खिलाये थे
हर कतराए लहू से वोह महक आए थे
आब तो यह आलम है, आशियाँ चेहेकता है
नाम से हमारे गुलिस्तान मेहेकता है,
पर आब हमें है जाना, के इक और फसाना है
कहीं दूर बियान बान मैं, इक उजड़ा आशियाँ है...
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