Saturday, September 12, 2009

कहीं दूर बियान बान मैं इक उजड़ा आशियाँ है

कहीं दूर बियान बान मैं, इक उजड़ा आशियाँ है
आए यहाँ पे हम थे, बस खाख ए ज़माना था
इन सूखती शाखों पे, फिर फूल खिलाना था
जो उजाडा था औरों ने, वोह फिर से बसना था
हर बूँद ने महनत की, तब फूल खिलाये थे
हर कतराए लहू से वोह महक आए थे
आब तो यह आलम है, आशियाँ चेहेकता है
नाम से हमारे गुलिस्तान मेहेकता है,
पर आब हमें है जाना, के इक और फसाना है
कहीं दूर बियान बान मैं, इक उजड़ा आशियाँ है...

No comments:

Post a Comment