Thursday, August 18, 2011

Jab tak the tum jeevan main mere,sab kuch naveen sa lagta tha….

ए थे जब तुम जीवन मैं, कुछ अजीबो garib सा लगता था,
मैं था मस्त अपने मैं, तुम्हारा आना मुझे अखरता था ।
चिंता नहीं थी तुम्हारी मुझे, क्यूंकि तब सब कुछ चलता था,
करता था सब मैं दिल से, कभी न किसी से डरता था ॥
पर फिर देखि चाहत तेरी, कुछ करने को बेताब सी,
जीवन मैं कुछ बन्ने को, भरने को ऊँची उड़ान सी,
तेरे सपनो को देख के मैं, कभी खुद पे ही बिगड़ता था,
सोचता था क्यूँ जीवें मैं मेरे, नहीं कोई ऐसी तमन्ना है,
क्यूँ जीवन मैं कुछ बन्ने को, मेरे दिल नहीं करता है,
तेरे सपनो के ज़रिये ही, मैंने कुछ करने का सोचा था,
तेरे माँन की चाहत को , पूरा करने का सोचा था ॥

जब तक थे तुम जीवन माँइन, सब कुछ नवीन सा लगता है...

याद है मुझे वोह दिन, जब तुम थोडा दर जाते थे,
लक्ष्य भूल, जाने क्यूँ किस विचार मैं खो जाते थे ।
पर मैं कभी भूला नहीं, की तुम्हारी भी कोई मंजिल है,
ले आया राह पर तुमको मैं, चाहे लेनी पड़ी मुझे बुरे है ॥

पथ पथ पर सोचा करता था, आखिर क्यूँ हूँ सख्त मैं,
मैं क्यूँ अइसा करता हूँ, कर सकता हूँ सब आसान मैं ।
पर जानता था मैं जीवन मैं, आसान होता कुछ भी नहीं,
बिन सहे कोयला भी, बनता कभी हिरा ही नहीं ॥
हर बार तुम्हारी शोहरत को देख, दिल यह कह उठता था...

जब तक थे तुम जीवन मैं मेरे, सब कुछ नवीन सा लगता था....

कोषइश की मैंने पूरी, के तुम आगे बड़ते रहे,
गिरे तुम, संभले भी तुम, लेकिन फिर भी चलते रहे ।
बैठे लड़ कर हर बार हम, लेकिन सब कुछ सुलझा लिया,
सरे गिले शिकवे भूल कर हमने, आगे को कदम बड़ा लिया ॥
मअहनत थी तुम्हारी, हिम्मत थी, हमारा तोह सिर्फ साथ था,
सुर थे तुम्हारे, गीत थे, हमरअ टीओह सिर्फ साज़ था ।
अच्छा लगता था हमें भी, जब नाम तुम्हारा होता था,
मेरा नहीं तेरा ही सही, पर नाम हमारा होता था ॥

जब तक थे तुम जीवन मैं मेरे, सब कुछ नवीन सा लगता था...

हम टीम थे, परिवार थे, यह देख के अच्छा लगता था,
तुम्हे आगे बढता देख, मुझे बहुत बल मिलता था ।
सीखता था नित नवीन कुछ, जो मुझे अंजना सा लगता था,
अपने जीवन मैं ढलने की, कोशिश मैं हआर पल करता था ॥

वक़्त ने दिया था जब धोखा मुझे, और मेरा जीवन उजाड़ गया,
मेरे जीवन का वृक्ष जब, जड़ से ही था उखड गया ।
जब वेदना जीवन के मेरे, कण कण मैं थी बास गयी,
और मायूसी जीवन मैं मेरे, मेरी श्रृष्टि सी थी बन गयी ॥
तब भी थे तुम वहां खड़े, मेरे परिवार के जैसे ही,
हर पल कहते थे मुझसे ही, काम की करो तुम फिकर नहीं ।
तुम्हारे भरोसे सब चोर कइ मैं, तब निश्चिन्त सा होता था...

जब तक थे तुम जीवन मैं मेरे, सब कुछ नवीन सा लगता था....

फिर एक वक़्त आया ऐसा भी, जब तुम हम से थे कट से गए,
न bola कुछ भी कभी hamme, bas dusron से ja mil गए
shayad याद तुम्हे था नहीं, जो kasht diye थे unhone कभी,
और aapne unhi का पथ, hamse prathak ho pakad लिया,
पर is सब मैं न jane क्यूँ, aapne hamme क्यूँ jakad लिया,
badnami di kai बार hamme, जैसे की saap ने daas लिया,
kahan से laye thइ, itna zehar bhar bhar के तुम
जो tumne je bhar के मुझ पर ugla था,

मैंने फिर भी कुछ kaha नहीं, सब कुछ u ही seh गया,
तुम्हे तुम्हारे सपनो sang chod, मैं आगे को nikal गया ।
यह soch मैं फिर भी था kush, के परिवार मैं सब कुछ अच्छा है,
naraz hua तोह kya hua, apna ही तोह baccha है ॥
Naraz है humse abhi, पर door kahan वोह jayega,
जब mann hoga shant uska, vapas laut वोह aayega ॥
पर फिर भी दिल के kone मैं kahi, दार बहुत सा लगता था...

जब तक थे तुम जीवन मैं मेरे, सब कुछ नवीन सा लगता था...

जब kasht होता था तुम्हे कभी, दर मुझे भी लगता था,
sehat की sada रही, fikr तेरी, पर मैं न कभी यह kehta था .
bimaar hue जब भी तुम, मैं भी roya करता था,
tadap raha है मेरा कोई, हर पल मैं सोचा करता था ॥
जब तक न mile khabar teri, मैं bechain सा rehta था,
मैं चाहे mil न sakun, पर auro को bheja करता था ।
पर meri इन baton को, jane के tumne samjha था,
bimaar hone पर भी tumne, मुझे kahi का न choरा था,
मैंने फिर भी di dua तुम्हे, कोशिश की मैं की परिवार toote नहीं,
पर tumne kiya wahi, जो लगता तुम्हे ही अच्छा था ॥

जब तक थे तुम जीवन मैं मेरे, सब कुछ नवीन सा लगता था...

याद aata है मुझे दिन wahi, tarif hui थी तुम्हारी kai,
पर तुम्हे pata है नहीं, us से pehle मैंने भी,
baat kari थी unse kai, kaha था unse की, तुम मेरी नहीं sunte ho,
prashansa karu जो मैं तुम्हारी, तुम use नहीं ginte ho ।
कुछ shabd tarif के भी, jod lena मेरी aor से ही
Samman hua था अच्छा, तुम्हे us पल को jeene को
मैं jaan कर भी न था वहां, कोशिश थी तुम khush रहो
Isliye tasveer तक से raha juda,
Aise kai, बहुत से kisse hain, जो मैंने तुम से नहीं kehne थे,
मेरी maun सी mahnat के, यह तोह bas कुछ gehne थे,
यह anmol moti, mann के gehre sagar मैं ही rehne थे
तुम्हे नहीं dikhlata मैं, और कभी न कुछ भी kehna था ॥

जब तक तुम थे जीवन मैं मेरे, सब kuch नवीन सा लगता था...

एक दिन ऐसा आया भी, जब usne मुझ को bhula दिया,
bola बहुत कुछ bura मुझे, मुझे neecha dikha दिया,
नहीं chora kahi का मुझे, sabke samne zalil kiya,
जो naata rishte bane थे कभी, वोह सरे usne tod diye,
और कभी करने को baat, सरे ही raste rok diye,
मैंने फिर से tasalli की, के baat नहीं है badi कोई,
मैंने mana है परिवार use, todunga न यह kasam कभी।

सोचा था aab कभी kahi, न dekhongअ, न doonga kasht कभी,
akele ही chal loonga, बॉस yuhi,
पर pata नहीं kya ichha है uski भी, chain lene deta मुझे नहीं,
हर पल हर दिन de deta है, मुझे nayi musibat कोई,
मैं बॉस use kehta raha, ja khush रह aab tu yaar मेरे,
भूल ja मुझे, जैसे मैं जीवन मैं था ही नहीं,
मैं भी jee loonga जीवन apna, जैसे मैं pehle jeeta था,

जब तक थे तुम जीवन मैं मेरे, सब कुछ नवीन सा लगता था...

आगे kya hoga pata नहीं, kaise यह जीवन beetega,
न पथ है कोई, ichha न कोई, न लक्ष्य कoi जो jeetega,
पर dekhta हूँ, हर पल मैं तुम्हे, जब तुम nayi uchai पर pahuchoge,
mana मैं न rahunga वहां, पर दिल kehta है तुम dhundoge,
us वक़्त, नहीं pata kahan से मैं, तुम्हे nazar तब aaonga,
मैं साथ तुम्हारे rahu न rahu, पर दिल से तोह साथ nibhaonga,

तोह jao तुम, आगे तोह bado, apna नवीन परिवार chuno,
लक्ष्य किसी का lekar तुम, aab apna कोई sapna तोह buno,
फिर dekho जीवन kaise तुम्हे, naye नवीन rup dikhata है,
baas करता हूँ itni dua rab से, sach, sach और sirf sach है yehi,
bhagwan न kare की mile तुम्हे, अपने परिवार मैं apna सा कोई,
jisko तुम dekho कभी kahi, kehna pade तुम्हे yehi....

जब तक तुम थे जीवन मैं मेरे, सब कुछ नवीन सा लगता था....
जब तक तुम थे जीवन मैं मेरे, सब कुछ नवीन सा लगता था....



No comments:

Post a Comment