सोचा था के हम यारों संग, ऐश करेंगे जीवन भर,
देखेंगे अपने बचपन को, उनके बच्चों में
पर दुनिया के इस मेले में , इस बेकार झमेले में,
साथ हमारा छूट गया, वोह वक्त हमारा बीत गया...
आब बैठे हैं अकेले में, कहते हैं की खुश हैं हम,
तू छूटा कोई और मिला, दुनिया का नया एहसास मिला।
पर क्यूँ इस मान के उप्वान में, एक खली कोना दीखता है,
सब कुछ है पर फिर भी कुछ सुना सुना लगता है।
लगता है इस कोने को भरने का वक्त जो था अ़ब बीत गया।
वोह वक्त हमारा बीत गया, वोह वक्त हमारा बीत गया
सोचा करते थे यारों संग, बचों का बचपन देखेंगे उनका हसना देखंगे, उनका रोना देखंगे।
अब तो बस यह हालत है, बचपन के दीदार को भी,पल पल रोना पढता है,
जीवन की गागर का अमृत यह,कब दो पातो में फस, टूट गया...
वोह वक्त हमारा बीत गया, वोह वक्त हमारा बीत गया
जो मिलते थे रोज़ हम्मे , और बॉटँते थे गम कभी ,
अ़ब रहते हैं अलग अलग,बातें होती हैं कभी कभी ,
कहते थे हम जिन्हें यार कभी,वोह उखड़े उखड़े से रहते हैं,
गम तो लम्बी बातें हैं, अ़ब खुशियाँ भी नही कहते हैं,
पल पल की होती थी ख़बर कभी, अ़ब बरसों लग जाते हैं,
पर अ़ब में यह समझ गया, यारों से रिश्ते रखने का उम्मीद से दामन भरने का, अ़ब समर्थ हमारा छूट गया...
वोह वक्त हमारा बीत गया, वोह हमारा बीत गया ...
Thursday, August 13, 2009
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