एक वोह भी वक़्त था, जब दुनिया थम जाती थी….
जब दूरदर्शन ९.०० बजे, बुनियाद दिक्लाती थी
जब चित्रहार के लिए, हम दिन भर तरसा करते थे
गानों की मधुर माला सुनने, हम काम छोड़ा करते थे
जब गोली होती थी छोटी से पर घंटो उसे चाबते थे
छुत्तियों के दिनों मैं, कॉमिक्स मैं घुस जाते थे
अब तोह यह आलम है, हर रोज़ बुनियाद देखते है
चैनल बदलो तो देखोगे, इतने सीरियल होते हैं
गानों का अब इंतज़ार नहीं, चैनल गानों के होते हैं
क्या देखे और क्या चोरें, यह सोच के अब हम रोते हैं
अब chocolate ne ले गोली की जगह, और वोह भी बड़ी होती है
पर कायेन कैसे उन्हें हम, आजकल दिअबेतेस बच्चों को होती है
कॉमिक्स अब नहीं दिखती हैं, PS 2 का ज़माना है,
पड़ने के दिन आब लड़ गे, आब विर्तुअल का ज़माना है…
सोचता हूँ मैं यह देख, जीवन के रंग हैं बदल गए
गर्मियां जब होती थी, तोह पानी भर भर laate थे
पानी की कीमत क्या होती है, हमको सब समझाते थे
जब धुप तेज़ हमें लगती थी, गोला रास भर, खाते थे
चुस्की ले ले कर, हम अपनी प्यास भुजते थे
छुट्टियाँ जब भी होती थी, खेल घर मैं होते थे
कुलेर की हवा मैं हम, चादर तान सो जाते थे
श्याम होते ही घर छोड़, खेलने चले जाते थे
मस्ती मैं समय निकल, दोस्स्तों संग खाते थे
जब मान हुआ, जहाँ हुआ, हम बेख़ौफ़ चले जाते थे
थक कर चूर हो घर पर आ, हम पल मैं सो जाते थे.
अब गमियां है बदल गयी, पानी की हैं कमी वहीँ
पर अब आते हैं तानकर भरम, कहते हैं पैसे की है कमी नहीं
जब धुप तेज़ सी लगती है, ICE करें अब खाते हैं
गोले, कुल्फी काम नहीं, उसे हनी करक बतलाते हैं
छुट्टियाँ जब होती हैं, कैंप मैं बच्चे जाते हैं
वक़्त बिताने को वहां, आप डांस भी सिक्लाते हैं
कुलेर का अब काम नहीं, सब एक चलते हैं
इसका कारन सब हमको, Allergies बतलाते हैं
शायम होते ही बाचे सब, टीवी पर लग जाते हैं
कभी सीरियल, कभी गमेस, तोह कभी नेट पर वक़्त बिताते हैं
दोस्तों के घर हैं दूर, और गाड़ी मिलती है कभी कभी
जाना होता है उनके घर, तोह तारिख मिल जाती है
जाता नहीं हैं कोई कही, ghum हो जाने के dar से
दुनिया सुरख्षित नहीं है अब , यह हम्मे बतलाते हैं
नींद हम्मे अब आती नहीं, हम गोलियां फिर खाते हैं
पहले होता था थोडा सा, और हम उसमें समां जाते थे
अब है सब कुछ फिर भी हम, असंठुष्ट हैं रह गए
जीवन के रंग हैं बदल गए, जीवन के रंग हैं बदल गए
Wednesday, April 21, 2010
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